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आईपीसी व सीआरपीसी में बड़े बदलाव; जानिए डिटेल्स में

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आईपीसी व सीआरपीसी में बड़े बदलाव; जानिए डिटेल्स में
चंडीगढ़ : सन् 1872 अंग्रेजों के जमाने में बनाई गई आईपीसी-सीआरपीसी तथा एविडेंस एक्ट में जिस प्रकार से बदलाव किए गए इसका असर समाज तथा खासतौर पर बुद्धिजीवी वर्ग व कानून के जानकार (अधिवक्ताओं) पर क्या रहेगा, इस बारे विशेष चर्चा हरियाणा -पंजाब- चंडीगढ़ बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष रणधीर सिंह बदरान से हुई। उन्होंने केंद्र सरकार खासतौर पर गृहमंत्री अमित शाह के इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि वास्तव में तो यह फैसला काफी पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन अब भी यह स्वागत योग्य है। अंग्रेजों के समय में बने कानून बदले सामाजिक ढांचे, बदली आर्थिक स्थितियां और आए आधुनिकीकरण के बाद अब ज्यादा प्रभावी नहीं रहे थे। जिस कारण से अपराधी अपराध करने के बाद आसानी से बच निकलते थे या फिर कई बार न्याय में देरी के कारण बहुत से एविडेंस (गवाह) इत्यादि की मृत्यु हो जाती थी, तब भी अपराधी आमतौर पर कानूनी दावपेंच खेल अपने गुनाह की सजा नहीं पा पाते थे। अब जिस प्रकार से बड़े बदलाव कानून में किए गए हैं, इससे न्याय जल्द होगा और काफी सस्ता होगा। इस बारे बदरान ने कहा कि आईपीसी में फिलहाल 511 धाराएं हैं, इसकी जगह भारतीय न्यायिक संहिता में अब 356 धाराएं रहेंगी। पुराने कानून से नए कानून में 175 धाराएं बदल जाएंगी। भारतीय न्यायिक संहिता में 8 नई धाराएं जोड़ी जाएंगी, 22 धाराएं हटाई जाएंगी। सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम में भी हुए बदलाव दंड प्रक्रिया संहिता यानि सीआरपीसी की जगह अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने ले ली है। सीआरपीसी की 484 धाराओं के बदले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 धाराएं हैं। नए कानून के तहत 177 प्रावधान बदले गए हैं जबकि 9 नई धाराएं और 39 उपधाराएं जोड़ी हैं। इसके अलावा 35 धाराओं में समय सीमा तय की गई है। वहीं नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में 170 प्रावधान हैं। इससे पहले वाले कानून में 167 प्रावधान थे। नए कानून में 24 प्रावधान बदले हैं। संसद के दोनों सदनों में पारित तीन विधेयकों ने अब कानून का रूप ले लिया है। अंग्रेजी शासनकाल के समय से इन आपराधिक कानूनों की जगह लेने वाले तीन संशोधन विधेयकों को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है। तीनों नए कानून अब भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम कहे जाएंगे, जो क्रमश: भारतीय दंड संहिता (1860), आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1898) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (1872) का स्थान लेंगे। कानूनों में बदलाव के साथ ही इनमें शामिल धाराओं का क्रम भी बदल गया है। भारतीय न्याय संहिता में क्या-क्या बदला भारतीय दंड संहिता में 511 धाराएं थीं, लेकिन भारतीय न्याय संहिता में धाराएं 358 रह गई हैं। संशोधन के जरिए इसमें 20 नए अपराध शामिल किए हैं, तो 33 अपराधों में सजा अवधि बढ़ाई है। 83 अपराधों में जुर्माने की रकम भी बढ़ाई है। 23 अपराधों में अनिवार्य न्यूनतम सजा का प्रावधान है। छह अपराधों में सामुदायिक सेवा की सजा का प्रावधान किया गया है। बता दें कि भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम इन तीन विधेयकों को लोकसभा ने 20 दिसंबर को और राज्यसभा ने 21 दिसंबर को मंजूरी दी थी। राज्यसभा में विधेयकों को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा पेश किए जाने के बाद ध्वनि मत से पारित किया गया था। 25 दिसंबर को राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद विधेयक कानून बन गए। संसद में तीनों विधेयकों पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि इनमें सजा देने के बजाय न्याय देने पर फोकस किया गया है। नए कानूनों से जल्द और संतोषजनक न्याय मिलेगा पीड़ित को बदरान ने कहा कि पुराने नियमों के अनुसार अपराधी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी न कर पाने के कारण बच निकलते थे और इस प्रकार के बदलावों की मांग लंबे समय से थी। कानूनी दांवपेंचों से अपराधी कानून की गिरफ्त से नहीं बच पाएगा। शीघ्र सस्ता न्याय मिलेगा यही भारत सरकार के प्रयास हैं। कुछ अपराध जो अपराध की कैटेगरी में नहीं थे उन्हें इनमें शामिल किया गया है। नए कानून आने से अपराधियों में डर और खौफ की भावना होगी। जिस प्रकार से साइबर क्राइम बढ़ रहे हैं क्रिमिनल्स का अपराध करने का नेचर भी बदल रहा है, अपराध करने के तरीकों में लगातार बदलाव देखे जा रहे हैं, अब उनमें रुकावट आएगी। जिस प्रकार से पहले ईमेल -व्हाट्सएप व अन्य कई महत्वपूर्ण चीजों को साक्ष्य नहीं माना जाता था, अब साइंटिफिक रिसर्च एविडेंस के तौर पर कोर्ट में मान्य होंगे। इन साक्ष्य के आधार पर अपराधी को पकड़ा जा सकेगा और यह कोर्ट प्रोसीडिंग्स में एक अच्छा माध्यम बनेंगे। कोर्ट में नोटिस भेजने में जो देरी होती थी वह काम भी ईमेल या व्हाट्सएप के माध्यम से आसान हुआ है। बुद्धिजीवी वर्ग वकीलों में इस बात को लेकर काफी हद तक सहमति है और समाज भी इस कदम से काफी खुश है। पुलिस जांच करने के बाद जब 173 की रिपोर्ट यानी अपना चालान कोर्ट में पेश करती थी तो एविडेंस में अपराधियों के केसों में काफी देरी होती थी, कई बार विटनेस तो कई बार पीड़ित की मृत्यु हो जाने का लाभ भी अपराधियों को होता था। काफी अपराधी जो बच जाते थे आगे ऐसा नहीं होगा। जल्द ही जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश होगी। एविडेंस जल्द ही कोर्ट में आएंगे तो न्याय अच्छा और जल्द मिलेगा। अपराधियों में डर का माहौल पैदा होगा। आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर विश्वास बढ़ेगा। अपराधियों की संख्या घटे और उनमें डर पैदा हो कानून का भी यही मकसद होता है। सामाजिक-आर्थिक और इलेक्ट्रॉनिक बदलावों की तर्ज पर हर 30-40 साल में बदल देने चाहिए कानून : बदरान बदरान ने कहा कि सामाजिक रूप से यह बदलाव काफी जरूरी थे। क्योंकि लंबे समय पहले बने इन कानूनों के बाद से इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों काफी अधिक बड़े हैं। आर्थिक और सामाजिक विकास हुआ है। समाज में एक बड़ा परिवर्तन आया है। अपराधों की प्रवृति में भी बदलाव आया है।महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने महिलाओं के प्रति अपराध की तेजी में मदद की है। इसी वजह से सख्त कानून की जरूरत थी। इन नए कानून में महिलाओं को ज्यादा सुरक्षा प्रदान की गई है ताकि महिलाओं के प्रति अपराध करने वाले बच ना पाए, महिलाओं को न्याय मिले और अपराधियों में खोफ पैदा हो, इसलिए यह बहुत जरूरी था। उन्होंने कहा कि हर 30-40 साल बाद जिस प्रकार से सोशल व इलेक्ट्रॉनिक बदलाव होते हैं कानून को भी बदल देने की जरूरत रहती है और सरकारों को हमेशा इस और गंभीरता से विचार करना भी चाहिए।